इस संग्रहालय में तीन प्रभाग हैं- विचार, आकार एवं सत्कार। ‘विचार’ में हस्तलिखित सामग्री है, वहीं ‘आकार’ में साहित्यकारों के उपयोग की वस्तुएँ और आवाज़ों का संग्रह किया गया है, जबकि ‘सत्कार’ में बैठक के साथ ही आगंुतकों को जानकारी उपलब्ध करवाने की व्यवस्था।
दुष्यन्त कुमार की डायरी, कविताएँ, नाटक, निबन्ध कहानियाँ, नोट बुक, ‘सांये में धूप’ की मूल पाण्डुलिपि
आदि लगभग 900 पृष्ठों की दुर्लभ सामग्री
सन् 1946 से 1975 तक
प्रमुख साहित्यकारों के पत्र
डाॅ. हरिवंश राय बच्चन, क्षेमचन्द्र सुमन, भवानी प्रसाद मिश्र, रामधारी सिंह दिनकर, रामकुमार वर्मा, डाॅ. शिवमंगल सिंह सुमन, जगदीश गुप्त आदि के लगभग 100 पत्र
दो हस्तलिखित पत्रिकाएँ
ईसवी सन् 1944 एवं 1946
भगवतीचरण वर्मा की 11 कहानियाँ
-अमृतलाल नागर की ‘बाबूजी’
-राही मासूम रज़ा के तीन निबन्ध
-अभिमन्यु अनत(माॅरीशस) की ‘डायरी -के पन्ने’
-माॅरीशस के लेखकों 10 पत्र
-हरिशंकर परसाई के व्यंग्य
-मणि मधुकर की कहानी
-गिरिजा कुमार माथुर की कविताएँ
-रामेश्वर शुक्ल अंचल की कविताएँ
-भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी
-प्रभाकर माचवे की कविता
-इलाचन्द्र जोशी की कहानी
-भीष्म साहनी की कहानियाँ और लेख
-प्रणवकुमार बंदोपाध्याय की -कहानी
-द्विजेन्द्रनाथ मिश्र निर्गुण की कहानी
-गोपाल सिंह नेपाली की कविता
‘आकार’ प्रभाग में धरोहर
1
दुष्यन्त कुमार का कोट, जिसे दुष्यन्त कुमार ने अपने जीवन के अन्तिम कवि सम्मेलन में 20 दिसम्बर 1975 को पहना था। (30 दिसम्बर 1975 को उनका देहान्त हो गया।)
2
दुष्यन्त कुमार की घड़ी, जो अन्तिम समय तक भी उनकी कलाई पर बँधी थी। हवाई यात्रा का टिकट, बैंक पास बुक, हुक्का आदि।
3
ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मानित मध्यप्रदेश के एकमात्र साहित्यकार श्री नरेश मेहता की छड़ी।
4
काका हाथरसी का उपयोग किया टाइपराइटर, जो सन् 1906 में खरीदा गया था।
5
शरद जोशी का चश्मा, जो अन्तिम समय तक उनके काम आता रहा।
6
शानी का टाइपराइटर, जिस पर ‘काला जल’ जैसा कालजयी उपन्यास तैयार हुआ।
7
शानी की घड़ी, जो अन्तिम समय तक भी उनकी कलाई पर बँधी थी।
8
डाॅ. शिवमंगल सिंह सुमन की कलम, जिससे संग्रहालय के लिए हस्ताक्षर किये।
9
दुष्यन्त कुमार को प्राप्त सम्मान पदक एवं प्रशस्ति पत्र, जो उन्हें मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद ने मरणोपरान्त प्रदान किया।
10
शलभ श्रीराम सिंह की कलम, जिसे भेंट करते हुए उन्होंने लिखा- ‘जिस कलम से लिखा इन्कलाबन अलिफ, वो कलम सर न था, सर कलम हो गया’।
11
पद्मभूषण से सम्मानित श्री विष्णु प्रभाकर का रजत श्रीफल, जो उन्हें किसी संस्था द्वारा सम्मानस्वरूप भेंट किया गया था।
12
पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, दादा माखनलाल चतुर्वेदी, डाॅ. हरिवंशराय बच्चन, सेठ गोविन्ददास, पं. सोहनलाल द्विवेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन आदि प्रख्यात एवं कालजयी दो दर्जन से अधिक रचनाकारों के ‘हाथ के छापे’ (सन् 1930 से 1960 के बीच) संग्रहालय में मूल रूप से सुरक्षित हैं।
इसके अलावा भी अनेक साहित्यिकारों की अमूल्य धरोहर, जो शोध और सन्दर्भ के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है।